नमामि गंगे की खुली पोल, गंगा जल ना तो पीने योग और ना ही नहाने के क़ाबिल।
February 29, 2020 • Sachin Kumar

यूपी:उन्नाव।

नमामि गंगे की खुली पोल, गंगा जल ना तो पीने योग और ना ही नहाने के क़ाबिल।

जहाँ एक तरफ देश की मोदी सरकार व प्रदेश की योगी सरकार नमामी गंगे के तहत गंगा सफाई को ले कर तरह-तरह के अभियान चलाती नज़र आ रही है तो वहीं गंगा सफाई एवं गंगा में मोक्ष की डुबकी लगाते व खुले में घूम रहे अवारा/गंदे जानवरों को ले कर मौजूदा सरकार के सारे दावे अब हवा हवाई साबित होने लगे हैं। जबकि अधिकतर अभियान अब सिर्फ कागजों में ही फर्राटे भरते नज़र आ रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं उन्नाव ज़िले की कोतवाली गंगाघाट क्षेत्र के मिश्रा घाट, गंगा घाट, बालू घाट से निकलने वाली जीवनदायिनी गंगा की और वहीं घाट पर खुलेआम घूम रहे गंदे जानवरों की।

आपको बता दें उन्नाव ज़िले के गंगा घाट से निकलने वाली गंगा नदी भारत के 11 राज्यों में आबादी के 40 प्रतिशत लोगों को पानी उपलब्ध कराती है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत की जीवनरेखा भी मानी जाती है परंतु अब गंगा दुनिया की छठी सबसे प्रदूषित नदी बन गई है। वहीं लोगों को मोक्ष दिलाने वाली गंगा का पानी प्रदूषण के कारण काला पड़ रहा है। गंगा में प्रदूषण का एक प्रमुख कारण इसके तट पर निवास करने वाले लोगों द्वारा नहाने, कपड़े धोने, सार्वजनिक शौच की तरह उपयोग करने, व खुले में घूम रहे अवारा मवेशि भी एक खास वजह है जो गंगा में प्रदूषण के स्तर को और बढ़ा रहा है।

वहीँ अब क्षेत्र में खुलेआम घूम रहे गंदे जानवरों के आतंक से भी क्षेत्र की जनता त्रस्त हो चुकी है और तो और श्रद्धालुओं के साथ गंगा में डुबकी लगाने के साथ-साथ जानवरों ने अब घरों में रख्खे खाने में भी मुँह मारना शरू कर दिया है जिसके चलते अब लोगों को तरह-तरह की बीमारियां भी लग रही हैं। तो वहीं बच्चों को भी जानवरों द्वारा हानि पहुंचाने की भी बात सामने आ रही है। जिन घाटों पर बैठकर कभी लोग गंगा के निर्मल जल में स्नान कर पापों का नाश किया करते थे आज उन घाटों से गंगा का जल दूर तो हुआ ही है साथ ही अब क्षेत्र के दबंग जानवर मालिकों द्वारा पानी मे जानवरों को छोड़ प्रदूषित भी किया जा रहा है।

गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिये केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने कई योजनाएँ बनाई हैं। हालांकि इन योजनाओं के तहत करोड़ों रुपए भी प्रदान किये गए हैं। गौरतलब है कि उन्नाव मेें ही गंगा को स्वच्छ करने के लिये काफी खर्चा किया गया, लेकिन इतने खर्चे के बावजूद भी देखा जाए तो मिश्रा घाट, गंगाघाट, बालू घाट आदि जगहों पर गंगा के पानी में ना तो प्रदूषण की मात्रा कम हुई और ना ही घाटों पर और क्षेत्र में फैली गंदी के स्तर में कोई कमी आई। सरकार द्वारा इन योजनाओं पर अरबों रुपए खर्च किये जा चुके हैं लेकिन हकीकत में क्या गंगा के प्रदूषण में कमी आई है?
या क्षेत्र के घाटों पर फैली जगह-जगह गंदी के स्तर में कोई कमी?* सच्चाई तो यह है कि इस सबके बावजूद भी न तो गंगा नदी के प्रदूषण में कमी दृष्टिगोचर हुई और ना ही घाटों पर और न ही क्षेत्रों में। योजनाएँ तो अच्छी हैं परन्तु जब तक इन योजनाओं का वास्तविक रूप से सही मायनों में क्रियान्वयन नहीं किया जाता तब तक इनका कोई प्रभाव दिखाई देना मुश्किल है। जनता भी इस विषय पर जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किये जा रहे हैं। *इतना सब कुछ होने के बावजूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं

अब देखना ये है कि क्या नगर पालिका उन्नाव ज़िले में बने घाटों पर व पुराने गंगा पुल के नीचे गंगाघाट पर खुले में घूम रहे आवारा एवं पालतू मवेशियों के मालिकों पर कार्यवाही करेंगे या फिर होली के सुभ अवसर पर अपनी-अपनी जेबें गरम कर प्रधानमंत्री के नमामी गंगे अभियान को ठेंगा दिखाते रहेंगे।