सास भी कभी बहू थी.....
February 27, 2020 • Sachin Kumar

''सास भी कभी बहू थी.....
बाहर सब बारात के आने की तैयारियों में लगे हुए थे और मैं तीस साल पहले की यादों में खो गई.... तीस साल पहले मैं इसी घर मे बहु बन कर आई थी। मन मे हजारों रंग के सपने सजाए, थोड़ा सा डर भी था अंजान लोंगो के बीच कैसे रहूंगी मैं, उनके विचार व्यवहार सब से अनभिज्ञ थी। दरवाजे पर पहुचते ही मेरी सास ने आ कर आरती उतारी, मेरे गले तक गिरे हुए घूँघट के अंदर भी लोगो की चीरती हुई आँखे पहुच रही थी, दहलीज पार करते ही सारी भीड़ ने मुझे घेर लिया। 

ससुराल में नई बहू की हालत और चिड़ियाघर में नए जानवर ही हालत एक जैसी ही हो जाती है, सब के आकर्षण का केंद्र वही रहते है। जैसे ही मैं कमरे में गई सारे रिश्तेदारों की टोली भी मेरे साथ पहुँच गई, मैं अपने आप को सामान्य करने के लिए एकांत खोज रही थी लेकिन भीड़ ने मेरा पीछा ना छोड़ा। सब के बीच मैं सहमी सी बैठी हुई थी। मुझे ब्याह कर लाने वाला पति मुझे कही दिखाई नही दे रहा था जिसकी मुझे उस वक्त जरूरत थी, वो आते भी कैसे ये जानते हुए की सब वहाँ तरह-तरह के मजाक बनाना शुरू कर देंगे। सब मुझे घूर रहे थे और मैं उनकी नज़रो से असहज महसूस कर रही थी, इनकी बुआ नज़रो से ही मेरे गहने तौल रही थी। 

इतने में मेरी सास भी आ गई, मैं चुप-चाप बैठी उनकी बातें सुनने लगी। बुआ ने कहा "बहु के मायके के गहने बड़े हल्के लग रहे है" तभी मेरी सास ने जवाब दिया "हमने तो कुछ ज्यादा मांगा नही था सोचा अपने मन से ज्यादा दे देंगे, खुशबू (मेरी बड़ी ननद) की शादी में हमने कितने भारी-भारी गहने बनवाये थे ससुराल वाले आज तक तारीफ करते है" उनकी वार्तालाप सुन के मैं अंदर तक हिल गई, ये कैसे लोग है जो नई बहू के सामने ही उसे नीचा दिखा रहे है, जितने सुनहरे सपने सजाई थी सब एक साथ टूटते नज़र आने लगे। मैं कुछ भी नही बोल पाई सिर्फ अपने परिवार वालो के लिए ऐसे शब्द सुन कर आँखों मे आँसू आ गए। 

नए घर के नए माहौल में ढलने की कोशिश करने लगी मैं, रसोई में जब पहली बार खाना बनाने गई तब कोई भी मदद के लिए नही आया, मुझे खाना बनाना आता था पर यहां के लोग कैसा खाना पसंद करते थे ये नही पता था, इसका नतीजा ये हुआ कि जो खाना मैंने बनाया उसे खाते ही सबके मुँह बन गए. "इतना मसालेदार खाना हम नही खाते, बाप रे मिर्ची की ही सब्जी बना दिये हो क्या, अरे रिफाइंड तेल में नही सरसों के तेल में सब्जी बनाना था, ये लो घी की जगह तेल से तड़का लगा दिया दाल को" मेरी सास भी सब की हां में हां मिला रही थी। मुझे यहाँ के तौर-तरीके सिखाने की बजाए मुझे ताने मिल रहे थे। 

सास से कुछ कहती तो वो अपनी सास के बारे में बताने लग जाती "अरे हमारे सास जैसी सास मिलती तब पता चलता तुमको, मेरी सास ने भी ऐसे ही अपना शासन चलाया था। तुम जब सास बनोगी तब तुम्हे पता चलेगा" "मीनू कहाँ हो जल्दी आओ पूजा की थाली ले कर बारात आ गई" बड़ी ननद की आवाज ने मेरी तंद्रा तोड़ी, मैं तीस साल पहले की यादों से बाहर आ कर अपने बेटे आयुष और बहू यामिनी के लिए पूजा की थाली ले कर आने लगी। दरवाजे पर खड़ी बहू को देख कर मुझे उसमे तीस साल पहले की मीनू दिखने लगी। 

मैंने दोनो की आरती उतारी बेटे बहू ने मेरे पैर छुए, मेरा दिल भर आया मैंने दोनो को गले से लगा लिया। अंदर आते ही मैंने बहू और बेटे को कमरे में आराम करने के लिए भेज दिया ताकी दोनों को थोड़ा अपने लिए समय मिल जाए। मैं ऐसा कोई भी गलत काम नही करना चाहती थी जो तीस साल पहले मेरी सास ने मेरे साथ किया था। सब रिश्तेदार बहू के घर से आये समान में मीन-मेख निकाल रहे थे तो मैंने भी कह दिया "समान से ज्यादा कीमती तो मेरी बहू है, हमने तो कुछ मांगा नही था पर उन्होंने बहुत-कुछ दे दिया" मेरे इस जवाब से रिश्तेदारों पर क्या फर्क पड़ा मुझे नही पता पर मेरी बहू ने जब मेरी बात सुनी तो उसके मन मे मेरे लिए प्यार और सम्मान बढ़ गया। 

रसोई पूजा के समय बहू ने खीर बनाई मैं वही खड़ी हो कर उसकी मदद करने लगी। उसे ये एहसास नही होने देना चाहती थी कि ये उसका ससुराल है जहाँ सास सिर्फ शासन करती है। यामिनी पहले दिन से ही मुझसे ज्यादा घुल-मिल गई थी, वो मजाक मजाक में कहती भी कि मम्मी मैंने सोचा कि आप भी बाकी लोंगो की सास के जैसे ही होंगे लेकिन आप तो मेरी मम्मा से भी अच्छे हो। मैं प्यार से उसके सर पर हाथ फेर कर कहती "बेटा मैंने बहू से सास बनने तक का सफर किया है इसलिए मुझे पता है कि बहू की क्या ख्वाहिश होती है और सास के क्या कर्तव्य होते है।" आज मैं और मेरी बहू दोंनो मिल कर काम करते है, कोई कहता ही नही हमे देख कर की हम सास बहू है, सब कहते है कि ये दोनों तो बिल्कुल माँ-बेटी लगते है। ये सुन कर मुझे बहुत खुशी होती है।

ये कहानी पढ़ कर बहुत से लोगों के मन मे विचार आ रहे होंगे कि वो बहू बहुत ही किस्मत वाली है जिसे मीनू जैसी सास मिली.... लेकिन मैं बस इतना ही कहूँगी कि क्यों ना हम ही आगे चल कर एक अच्छी सास बन जाये, अगर आप एक बेटे की माँ है तो अभी से एक अच्छी सास बनने की शुरुवात कर दीजिए.... क्योंकि सास भी कभी बहू थी और हर बहू कभी ना कभी सास बनेगी। बदलाव हम खुद से ही करेंगे ताकी आगे चल कर हर सास को एक अच्छी बहू मिले और हर बहू को एक अच्छी सास।
एक सुन्दर रचना.....