तीन गुना पानी बर्बाद करता है RO, सेहत के लिए भी है खतरनाक, पढ़ें- विशेषज्ञ की राय
March 2, 2020 • Sachin Kumar

तीन गुना पानी बर्बाद करता है RO, सेहत के लिए भी है खतरनाक, पढ़ें- विशेषज्ञ की राय
[नरपतदान चारण]। वाटर आरओ के उपयोग से बड़े पैमाने पर हो रही पानी की बर्बादी को देखते हुए हाल ही में नेशनल ग्रीन टिब्यूनल (एनजीटी) ने पर्यावरण मंत्रलय को निर्देश दिया है कि वह दो महीने के अंदर उन जगहों पर आरओ प्यूरीफायर को प्रतिबंधित करने की अधिसूचना जारी करे जहां पानी में टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड) प्रति लीटर 500 मिलीग्राम से नीचे है। इससे पहले एनजीटी सरकार से यह भी कह चुका है कि देश भर में जहां भी आरओ (रिवर्स ओस्मोसिस यानी पानी को पीने लायक स्वच्छ बनाने की एक विधि) की अनुमति दी गई है, वहां 60 फीसद से ज्यादा पानी दोबारा इस्तेमाल किया जाए, ताकि आरओ से होने वाली पानी की बर्बादी को रोका जा सके।

500 TDS तक RO की जरूरत नहीं

दरअसल जहां पानी में टीडीएस 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम हैं, वहां के पानी को साफ करने के लिए आरओ का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं है, क्योंकि पानी में प्रति लीटर 500 एमजी तक टीडीएस होने पर आरओ काम नहीं करता, बल्कि उलटे उसमें मौजूद कई महत्वपूर्ण खनिजों को हटा देता है, जिससे पानी से स्वाभाविक रूप से मिलने वाले मिनरल्स नहीं मिल पाते। यह चिंतनीय है कि देश के कई शहरों में अंधाधुंध जलदोहन और पानी की बर्बादी के कारण भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है। पानी की स्वच्छता को लेकर हर कोई संवेदनशील तो है, लेकिन स्वच्छ पानी के चक्कर में लोग हर रोज लाखों लीटर पानी नाली में बहा देते हैं।

तीन गुना पानी बर्बाद करता है RO

असल में लोग इस बात से नावाकिफ हैं कि शुद्ध पानी दे रहा आरओ प्यूरीफायर जितना पानी साफ करके देता है, उसका तीन गुना पानी बर्बाद कर देता है। भू-जल स्तर गिरने का भी यह एक बड़ा कारण है। पीने के पानी के शुद्धिकरण के लिए आरओ वाटर प्यूरीफायर की जरूरत के बारे में पड़ताल किए बिना जल शोधन के लिए इसका उपयोग तेजी से बढ़ा है। आजकल देखादेखी में लगभग हर घर में आरओ लगाया जा रहा है। गौरतलब है कि आरओ का विकास ऐसे क्षेत्रों के लिए किया गया है, जहां पानी में घुलित खनिजों (टीडीएस) की अत्यधिक मात्र पाई जाती है। इसलिए सिर्फ टीडीएस को पानी की गुणवत्ता का मापदंड मानकर आरओ लगाना सही नहीं है।

*सेहत के लिए भी खतरनाक है RO*

विशेषज्ञों के मुताबिक पानी की गुणवत्ता कई जैविक और अजैविक मापदंडों से मिलकर निर्धारित होती है। जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां आरओ की जरूरत नहीं है। जिन जगहों पर पानी में टीडीएस की मात्र 500 एमजी प्रति लीटर से कम है, वहां घरों में सप्लाई होने वाले नल का पानी सीधे पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। आरओ का उपयोग अनावश्यक रूप से करने पर सेहत के लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण खनिज तत्व भी पानी से अलग हो जाते हैं। इसीलिए, जल शुद्धीकरण की सही तकनीक का चयन करने से पहले यह निर्धारित करना जरूरी है कि उस इलाके में पानी की गुणवत्ता कैसी है। उसके बाद ही जल शुद्ध करने की तकनीकों का चयन किया जाना चाहिए।

*फ्लोरिडा में 1949 में पहली बार इस्तेमाल हुआ था RO*

आरओ मशीन का पहली बार इस्तेमाल वर्ष 1949 में अमेरिका के फ्लोरिडा में किया गया था। इस मशीन का असल मकसद खारे पानी वाले समुद्र से पीने लायक पानी निकालना था। लेकिन इसका इस्तेमाल वहां भी किया जाने लगा जहां पर पानी का खारापन उतना अधिक नहीं था जितना समुद्र का होता है। इससे पानी की बहुत अधिक बर्बादी और पानी में मौजूद जरूरी लवणता और खनिज पदार्थ नष्ट होने के नुकसान सामने आने लगे। एक तरफ किसानों से पानी की हर बूंद को बचाने के लिए बहुत तेजी से ‘डिप इरिगेशन’ अपनाने के लिए कहा जाता है। लेकिन अधिकांश लोग घरों में आरओ मशीनों का उपयोग कर पानी बर्बाद करते हैं। ऐसे में हमें घरों में हर दिन बर्बाद होने वाले पानी के बारे में बात क्यों नहीं करनी चाहिए? क्या पानी की हर बूंद को बचाना सबकी जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? क्या हम तकनीक से बिगड़ते हुए रास्ते को नहीं अपना रहे हैं?

*और भी तकनीक हैं पानी साफ करने की*

पेयजल के बढ़ते संकट को देखते हुए आरओ की रिकवरी क्षमता की ओर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे वाटर प्यूरीफायर्स के निर्माण को प्रोत्साहित करने की जरूरत है, जो पानी की अधिक रिकवरी कर सकें। रिकवरी क्षमता के आधार पर आरओ संयंत्रों को बिजली के उपकरणों की तरह स्टार रेटिंग दी जानी चाहिए। यह भी कि जल शुद्धिकरण के लिए सिर्फ आरओ पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। दूषित पानी को साफ करने के लिए ग्रेविटी फिल्टरेशन, यूवी रेडिएशन और ओजोनेशन जैसी कई अन्य तकनीकें भी उपलब्ध हैं, उनका उपयोग बढ़ाना चाहिए। वर्तमान में तकरीबन 60 करोड़ भारतीय पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। तमाम शहरों का भूमिगत जलस्तर हद से अधिक नीचे चला गया है। ऐसे में पीने के पानी के संरक्षण लिए नए उपायों को अपनाने की बहुत आवश्यकता है।

*क्या है टीडीएस*

टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सोलिड्स) यानी पानी में घुले हुए सूक्ष्म ठोस तत्व। जैसे कि कैल्शियम, मैग्नीशियम क्लोराइड, कैल्शियम और मैग्नीशियम सल्फेट आदि। इन खनिजों के कारण ही पानी का स्वाद ज्यादा या कम खारा होता है। इनके अलावा पानी में कई खतरनाक ठोस तत्व भी मिले होते हैं, जैसे आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक प्रति लीटर पानी में 300 एमजी से नीचे टीडीएस बेहतरीन माना जाता है, जबकि 800 से 900 एमजी खराब और इससे ज्यादा होने पर पानी को पीने योग्य नहीं माना जाता है।